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Wednesday, 15 January 2014

मंत्री विजय शाह ने ईको पर्यटन विकास स्थल का किया निरीक्षण जिले के खालवा विकासखण्ड के आंवलिया और कालीघोड़ी में बताई ईको पर्यटन की अपार संभावनाएँ वन विभाग कर रहा है विकसित दुर्लभ प्रजाति के उल्लू और ऐतिहासिक पुरातत्व महल होंगे आकर्षण का केन्द्र

मंत्री विजय शाह ने ईको पर्यटन विकास स्थल का किया निरीक्षण

जिले के खालवा विकासखण्ड के आंवलिया और कालीघोड़ी में बताई ईको पर्यटन की अपार संभावनाएँ

वन विभाग कर रहा है विकसित

दुर्लभ प्रजाति के उल्लू और ऐतिहासिक पुरातत्व महल होंगे आकर्षण का केन्द्र





 

खंडवा (15 जनवरी, 2014) - जिले के खालवा विकासखण्ड के अंतर्गत आने वाले वनग्राम आवंलिया और कालीघोड़ी में ईको पर्यटन की अपार संभावनाएँ हैं। यह बात प्रदेश के खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री कुँवर विजय ने कहीं। उन्होंने आंवलिया और कालीघोड़ी के प्राकृतिक सौंदर्य का नजारा लेने के बाद गौंड राजाओं के प्राचीन किले का निरीक्षण भी किया। साथ ही ईको पर्यटन के क्षेत्र में इन्हें विकसित करने के प्रभावी कदम प्रयास करने के निर्देश भी दिये।
यह है खास
16 किलोमीटर की ट्रेकिंग की व्यवस्था :-  वनग्राम आंवलिया और कालीघोड़ी में विकसित किये जा रहे ईको पर्यटन क्षेत्र मंे आने वाले पर्यटकों के लिये प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारनें, वन की विशालता व रहस्यों को नजदीक से देखने, समझने का मौका का जहाँ मिलेगा, वहीं वन्यप्राणियों के रहवास आदि को जानने समझने के लिये टेªकिंग (पैदल चलना) की व्यवस्था भी की जा रही है। जिसके अंतर्गत कालीघोडी से वनग्राम झिरपा जिसकी की लम्बाई 16 किलोमीटर है। उसका चयन कर विकसित किया गया है।
दौ सौ से अधिक पक्षियों की प्रजातियाँ है उपलब्ध :- वन विभाग के द्वारा ईको पर्यटन के रूप में विकसित किये जा रहे इन वनग्रामों में पर्यटकों को जंगल में पाये जाने वाले वन्यप्राणियों के विभिन्न रहवास स्थलों एवं प्रकृति के विभिन्न पहलूओं की पहचान कराने के लिये परिक्षेत्र पूर्व कालीभीत सामान्य में कालीघोड़ी माता मंदिर से होते हुए 584 वनकक्ष तक के मार्ग का चयन करने के साथ ही विकसित किया गया है।
उप वनमंडलाधिकारी ने इस क्षेत्र की विशेषता को बताते हुए जानकारी दी कि इस नेचरटेªल में वन्यप्राणी एवं पक्षी दर्शन तथा इनके छायांकन, पक्षी पे्रमियों के लिये पर्यटन स्थल एक उपयुक्त जगह है। यहाँ के वनक्षेत्रों में लगभग 200 पक्षीयों की प्रजातियां पायी जाती हैं। मोर प्रकृति के साथ देखने का उत्तम स्थल है। पक्षी वर्ग में विभिन्न जलिय एवं स्थलीय पक्षी प्रजातियों की पहचान पंखों के रंग, घोसलों की बनवाट, आवाज की विभिन्नता, उडनें की प्रक्रिया, शाररीक संरचना, अंडों की संख्या एवं आकार एवं बच्चों की सुरक्षा आदि जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
पाए जाते हैं दुर्लभ प्रजाति के उल्लू भी :- उप वनमंडलाधिकारी ने निरीक्षण के दौरान मंत्री श्री शाह को जानकारी देते हुए बताया कि कालीभीत के जंगलों में अत्यंत दुर्लभ एवं अत्यंत खतरें में पड़ी प्रजाति के रुप में वर्गीकृत जंगली छोटा उल्लू (FOREST OWLET: Heteroglaux blewitti) पाया जाता है। जिसके विषय में विस्तृत जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि यह पक्षी आई.यु.सी.एन. की रेड डाटा लिस्ट मंे शामिल है। Forest Owlet सबसे पहले वर्ष 1875 में एफ.आर.ब्लेविट द्वारा मध्यप्रदेष (वर्तमान छत्तीसगढ़) में देखा और वर्णित किया गया। तत्पष्चात वर्ष 1880 से 1884 के बीच उत्तर-पष्चिम महाराष्ट्र के तलोड़ा से इस पक्षी के कुछ नमूने संग्रहित किये गये। लगभग एक शताब्दी से अधिक अवधि में यह Forest Owlet का अंतिम अभिलेखन था। लगभग 113 वर्षों के अंतराल के बाद Forest Owlet को भारतीय पक्षियों की सूची में वर्ष 1997 में पुनः शामिल किया गया। 
पाँच प्रदेशों में कुल 44 जिसमें खंडवा वनमंडल में पाए गए 18 जंगली छोटे उल्लू :- उल्लेखनीय और इस ईको पर्यटन क्षेत्र की महत्वपूर्ण बात यह होगी कि वर्ष 2007 में श्रीमती प्राची मेहता एवं अन्य सहयोगियों तथा वर्ष 2011 में श्री गिरीष जाथड़ एवं अन्य सहयोगियों द्वारा प्रस्तुत अन्वेषण प्रतिवेदन के अनुसार मध्यप्रदेष, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उड़ीसा एवं गुजरात राज्यों में Forest Owlet की उपस्थिति जानने हेतु वृहद् सर्वेक्षण किया गया। नवीनतम प्रतिवेदन में सूचित कुल 44 की संख्या में से 18 पक्षी खण्डवा वनमण्डल के कालीभीत के वनक्षेत्रों में पाये गये। Forest Owlet सागौन वनों में, जहाँ सागौन वृक्षों की संख्या बहुत अधिक हो तथा मिश्रित प्रजाति के वृक्ष कम संख्या में हो, में पाये जाते है। थ्वतमेज व्ूसमज का इस क्षेत्र में पाया जाना अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
ऐतिहासिक एवं पुरातत्व महत्व के स्थल :- ईको पयर्टन विकास स्थल कालीघोड़ी वनक्षेत्र में कालीघोड़ी माता मंदिर,गोंड राजाओं का प्राचीन किला,बावडी,प्राचीन शिवमंदिर आदि के दर्शन हेतु पर्यटक हजारों की संख्या में दर्शन के लिये आते हैं। इस क्षेत्र में पर्यटक सुविधाओं के विकास से एवं प्रचार-प्रसार के माध्यम से और विकसित किया जावेगा।
यह कार्य किये गये प्रस्तावित :- ईको पर्यटन स्थल विकास योजना में प्रस्तावित कार्यों की जानकारी देते हुए उप वनमंडलाधिकारी ने बताया कि इसमें:-
§    पर्यटन मार्ग उन्नयन (बाराजोशी नाले से झिरपा 250 टर्निग मार्ग)
§    ईको फ्रेंडली ट्री हाऊस
§    लाईग फाक्स (रोप-वे निर्माण)
§     बर्मा ब्रिज निर्माण
§    नेचरटेªल निर्माण 16 कि.मी.
§     पेगोडा निर्माण (बेलादेव पहाड़)
§     पेगोडा निर्माण (मोंतीगढ पहाड़)
§     व्याख्या केन्द्र आंवलिया
§     वाचटावर बेलादेव पहाड़
शामिल है।
टीप:- फोटो क्रमांक 1501141 से 1501146 तक मेल की गई हैं।
क्रमांक: 76/2014/76/वर्मा

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